Thursday, January 27, 2011

ENIGMA

Your enigmatic smile
at the dawn ,like the chirping of birds
setting to the firmament, expectant and free
like the auroral sun ,emerging from the hummock
with the rays infiltrating through a banyan tree.

Your enigmatic smile
in the noon ,aneglic with the Apollo's benison
warm like metallic bars of the sanctum
mysterious like the sphinx, enconcing
in the glaring scorching sun

Your enigmatic smile
at the dusk ,gloomy like the sillhouette
of the trees in the countryside.
epitomizing the Monalisa's grimace,
puzzling the connoisseurs worldwide.

Your enigmatic smile
in the night ,shimmering on the river screen
with the moon playing in the cloud,
like a shooting star, appearing
for a while and getting exposed out.

वो लड़की

सुबह ये कहती है मुझसे
क्यों तनहा यों उठ आते हो |
जो मोती बनकर गिरती थी
वो ओस सी लड़की कहाँ गयी ?

वो चंट गिलहरी कहती है
अब दाने कम पड़ जाते है |
जो फलियाँ साथ लुटाती थी
वो बेल सी लड़की कहाँ गयी ?


तितली कहती है मुझसे
अब बागों में नहीं आते हो
बालों पे जिसके उड़ती थी
वो फूल सी लड़की कहाँ गयी ?


सागर तट पर तोड़ घरोंदे
लहरें मुझे चिढाती है |
जो तिनके शंख सजाती थी
वो सीप सी लड़की कहाँ गयी ?


दीवारें मुझसे कहती है
क्या बाते खुद से करते हो |
जो बातों से स्वेटर बुनती थी
वो उन सी लड़की कहाँ गयी ?



छत पर तारे कहते है
क्यों हमको गिनने आते हो?
जो जुड़ों में जुगनू रखती थी
वो रात सी लड़की कहाँ गयी ?


छुटकी कहती है भैया
अब व्यस्त नहीं तुम मिलते हो|
जो बीजी तुमको रखती थी
वो फोन सी लड़की कहाँ गयी ?


अब रात, गिलहरी,लहरे,
तितली ,तारे मुझे डराते है
कांटे कौए सुरा अँधेरे
सब यार मेरे बन जाते है |


लम्हे होते गुलज़ार बहुत
पर हाय वक्त से छले गए
हम आते आते आ न सके
तुम जाते जाते चले गए |